कल 30 अक्टूबर 2016 को देश और दुनिया ने दीयों और रोशनी का त्योहार दीवाली मनाया। आज 31 अक्टूबर को गोवर्धन पूजा है। ये पूजा हर साल दीवाली के अगले दिन पड़ती है। इसे दीवाली के बाद कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है। इस त्योहार में बलि पूजा, अन्न कूट, मार्गपाली जैसे उत्सव पूरे किए जाते हैं। भगवान कृष्ण के द्वापर युग में अवतार के बाद अन्नकूट या गोवर्धन पर्वत पूजा की शुरुआत हुई थी। इसे लोग अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं। गोवर्धन पूजा में गोधन यानी गायों की पूजा की जाती है। हमारे शास्त्रों में गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप कहा गया है। जिस तरह देवी लक्ष्मी सुख समृद्धि प्रदान करती हैं ठीक उसी तरह गौ माता भी अपने दूध से हमें स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं।

पूजा विधि

दीवाली के बाद होने वाली गोवर्धन पूजा का खास महत्व है। इस पूजन में घर के आंगन में गाय के गोबर से गोवर्धननाथ जी की अल्पना बनाकर उनका पूजन करते हैं। इसके बाद ब्रज के साक्षात देवता माने जाने वाले गिरिराज भगवान को प्रसन्न करने के लिए उन्हें अन्नकूट का भोग लगाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में गाय बैल आदि पशुओं को स्नान कराकर फूल मालाएं धूप, चन्दन आदि से उनका पूजन किया जाता है। गायों को मिठाई खिलाकर उनकी आरती उतारी जाती है और प्रदक्षिणा की जाती है। गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर पानी, रोली, चावल, फूल दही और तेल का दीपक जलाकर पूजा करते हैं और साथ में परिक्रमा की जाती है।

गोवर्धन पूजा की कथा

द्वापर युग से चली आ रही गोवर्धन पूजा की परंपरा आज भी चली आ रही है। इससे पहले ब्रज में इंद्र की पूजा की जाती थी, लेकिन भगवान कृष्ण ने ब्रजवासियों को तर्क दिया कि इंद्र से हमें कोई लाभ नहीं मिलता है। बारिश करना उनका काम है और वह केवल अपना काम करते हैं, जबकि गोवर्धन पर्वत गौ-धन का संवर्धन एवं संरक्षण करता है। जिसकी वजह से पर्यावरण भी शुद्ध होता है। इसलिए इंद्र की नहीं बल्कि गोवर्धन पर्वत की पूजा की जानी चाहिए। इसके बाद इंद्र ने ब्रजवासियों को बहुत तेज बारिश से डराने की कोशिश की, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठाकर सभी गोकुलवासियों को उनके गुस्से से बचा लिया। इसके बाद से ही इंद्र भगवान की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करने की परंपरा शुरू हो गई। यह परंपरा आज भी बदस्तूर जारी है।

पूजा का महत्व

माना जाता है कि भगवान कृष्ण का इंद्र के घमण्ड को तोड़ने के पीछे उद्देश्य था कि ब्रजवासी गौ-धन और पर्यावरण के महत्व को समझें और उनकी रक्षा करें। आज भी हमारे जीवन में गायों का विशेष महत्व है। आज भी गायों के द्वारा दिया जाने वाला दूध हमारे जीवन में बेहद अहम स्थान रखता है। मान्यता है कि गोवर्धन पूजा के दिन अगर कोई दुखी है, तो पूरे साल भर दुखी ही रहेगा। इसलिए सभी को इस दिन खुश होकर इस उत्सव को सम्पूर्ण भाव से मनाना चाहिए।