साल 1971 में ब्रिटेन के संडे टाइम्स में छपे एक लेख ने दुनिया भर में भूचाल ला दिया था। आज का बांग्लादेश 1971 के वक्त पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था। वहां पाकिस्तान सरकार की बर्बरता की कहानी जब संडे टाइम्स में छपी तो मानो हर तरफ हाहाकार मच गया। पाकिस्तानी हुकूमत बर्बरता से पूर्वी पाकिस्तान में उठे विद्रोह को कुचलने के लिए हत्याएं कर रही थी। उस वक्त संघर्ष पूर्वी पाकिस्तानी पार्टी जो आज की अवामी लीग कहलाती है की चुनाव में जीत के बाद शुरू हुआ था जो उस क्षेत्र के लिए ज़्यादा स्वायत्तता की मांग कर रही थी। पूर्वी पाकिस्तान में इन हालात के बीच बगावत पनपी जिसे कुचलने के लिए पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान पर जमकर अत्याचार किए। इससे घबराकर लाखों लोग भारत की सीमा में घुस गए। भारत और पाकिस्तान की जंग की पृष्ठभूमि में बांग्लादेश लिबरेशन वॉर है। दबदबे वाले पश्चिमी पाकिस्तान और ज़्यादा बड़ी आबादी वाले पूर्वी पाकिस्तान के बीच विवाद के बाद बांग्लादेश लिबरेशन वॉर की शुरुआत हुई।

पाकिस्तान में हुए 1970 के चुनावों के बाद इसने तेजी पकड़ी। इस चुनाव में मुजीब-उर-रहमान ने बहुमत हासिल किया। लेकिन पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के नेता जुल्फिकार अली भुट्टो ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का पद मुजीब-उर-रहमान को देने से इनकार दिया। इसके बाद राष्ट्रपति याह्या खान ने सेना को बुलवा लिया। याह्या खान ने सेना के जरिए मुजीब उर रहमान के समर्थकों की धरपकड़ शुरू कर दी। कई दिनों के विरोध और संघर्ष के बाद 25 मार्च, 1971 की रात पाकिस्तान सेना ने ढाका पर हमला बोल दिया। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां शुरू हो गईं। मुजीब-उर-रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग का दमन शुरू हुआ। कई नेताओं ने भारत में जाकर शरण ली। जबकि, कइयों को पश्चिमी पाकिस्तान में कैद कर दिया गया। 27 मार्च, 1971 को पाकिस्तानी सेना के मेजर जिया उर रहमान ने बगावत कर दी। जिया ने मुजीब उर रहमान की ओर से बांग्लादेश की आज़ादी का ऐलान कर दिया।

पाकिस्तानी जनरल टिक्का खान के नेतृत्व में पाकिस्तानी सेना ने ढाका में बड़े पैमाने पर नरसंहार किए। इसके नतीजे के तौर पर लाखों की तादाद में लोग भारत की सीमा में घुस गए। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की गुहार की। लेकिन किसी भी देश ने दखल देने से इनकार कर दिया। नवंबर 1971 के आते-आते भारत और पाकिस्तान के बीच जंग के पूरे आसार बन गए। बांग्लादेश से सटे पूर्वी छोर पर भारतीय सेना का भारी जमावड़ा शुरू हो गया। लेकिन भारतीय सेना ने ठंड के मौसम के आने का इंतजार करना सही समझा। क्योंकि सेना को लगता था कि सूखे मैदानों में ऑपरेशन करना आसान होगा और ठंड के चलते हिमालय में बर्फ जम जाएगी जिससे चीन की दखलअंदाजी की आशंका भी खत्म हो जाएगी।

23 नवंबर, 1971 को पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल याह्या खान ने आपातकाल का ऐलान करते हुए अपने देशवासियों को जंग के लिए तैयार होने को कहा। 3 दिसंबर, 1971 को रविवार के दिन पाकिस्तानी सेना ने शाम के करीब 5 बजकर 40 मिनट पर उत्तर पश्चिमी भारत के 11 एयरबेस पर हवाई हमले शुरू कर दिए। इसमें आगरा भी शामिल था। इस हमले से कुछ रनवे बर्बाद हो गए। पाकिस्तान ने इस हमले को ऑपरेशन चंगेज खान नाम दिया। उसी शाम देश के नाम संदेश में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा कि भारत पर हवाई हमला जंग का ऐलान है।

पाकिस्तान के हमले के जवाब में भारतीय वायु सेना ने भी हवाई हमले शुरू कर दिए। प्रधानमंत्री ने इसके साथ ही भारतीय सेनाओं को हमले का आदेश दे दिया। थल, वायु और नौसेना ने जबर्दस्त तालमेल दिखाते हुए पाकिस्तानी सेना के दांत खट्टे करने शुरू कर दिए। पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय सेना की रणनीति यह थी कि पाकिस्तान को भारत में प्रवेश न करने दिया जाए। इस युद्ध में तत्कालीन थलसेना अध्यक्ष और चीफ ऑफ स्टाफ सैम मानेकशॉ की अगुवाई में भारतीय जवानों ने अपनी जांबाजी की अनूठी मिसाल पेश की थी। इस जंग के कई नायकों में से एक जेएफआर जैकब ने ही ये फैसला लिया था कि सबसे पहला लक्ष्य होगा ढाका। जब जैकब ढाका के पास पहुंचे तो उनके पास 3 हजार जवानों की फौज थी, जबकि पाकिस्तान सेना के प्रमुख जनरल नियाजी के पास करीब 30 हजार फौजी थे, लेकिन नियाजी जानता था कि बंगाली लोग उसके खिलाफ हैं।

पहली बार भारतीय इतिहास में वायुसेना, थलसेना और नौसेना ने एक साथ मिलकर पाकिस्तान के खिलाफ जंग छेड़ दी थी। टार्गेट था ढाका से पाकिस्तान को बाहर निकाल फेंकना। 7 दिनों के भीतर ही पाकिस्तानी फौज की हालत पतली होने लगी थी। वायुसेना ने तेजगांव, कुर्मीटोला, लाल मुनीर हाट पर जबर्रदस्त हमला बोल दिया था। तो वहीं नौसेना ने भी चारों तरफ से पूर्वी पाकिस्तान को घेर लिया था। थल सेना भी ढाका के आसपास पूरी तरह से कब्जा कर चुकी थी। भारत से हार का डर पाकिस्तान को सता रहा था इसलिए पाकिस्तानी हुक्मरान संयुक्त राष्ट्र से मामले में दखल देने की अपील करने लगे। जुल्फिकार अली भुट्टो अमेरिका में बैठ कर युद्ध विराम समझौते के लिए कोशिश कर रहे थे। लेकिन इधर युद्ध के मैदान में तो पाकिस्तानी सेना के भारतीय सेना ने छक्के छुड़ा दिए थे।

आखिरकार 13 दिनों बाद 16 दिसंबर को भारत की ओर से पूर्वी कमान का नेतृत्व कर रहे जेएफआर जैकब ने नियाजी से कहा---मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि आप अगर जनता के बीच आत्मसमर्पण करना चाहते हैं तो हम आपकी और आपके आदमियों की सुरक्षा की गारंटी लेते हैं। भारत सरकार ने इस बारे में वादा किया है और हम आपकी और आपके लोगों की सुरक्षा का भरोसा दिलाते हैं।

जैकब ने अपनी किताब में ये लिखा है----मैं नियाजी से लगातार बात करता रहा और आखिर में मैंने कहा कि नियाजी मैं तुम्हें इससे बेहतर डील नहीं दे सकता हूं। मैं तुम्हें 30 मिनट देता हूं। अगर तुम कोई फैसला नहीं कर पाए तो मैं हमले का आदेश दे दूंगा। बाद में नियाजी के दफ्तर से जैकब लौट आए। जैकब बताते हैं---मैं नियाजी के पास टहलते हुए पहुंचा। मेज पर सरेंडर के कागजात रखे हुए थे। मैंने पूछा, जनरल क्या आप इसे मंजूर करते हैं? मैंने नियाजी से तीन बार पूछा, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया। इसके बाद पाकिस्तान सेना ने सरेंडर कर दिया। इस सरेंडर के साथ ही पाकिस्तान को भारत से करारी शिकस्त मिली और जन्म हुआ एक नए मुल्क बांग्लादेश का।