पुरुष ही नहीं, महिलाएं और बच्चे भी गड्ढे खोद उसमें गर्दन तक समाधिस्थ अवस्था में बैठे हैं। वे किसी देवी-देवता का अनुष्ठान नहीं कर रहे, न कोई तपस्या कर रहे हैं। वे दरअसल, अपनी जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, आंदोलनरत हैं। स्थान है राजस्थान की राजधानी से कोई बीस किलोमीटर दूर स्थित गांव नींदड़। अपने इस आंदोलन को ग्रामीणों ने नाम दिया है 'जमीन समाधि सत्याग्रह', जी हां, इस कृषि प्रधान देश के कृषि पर जीने वाले राज्य में किसानों को अपने खेत की जमीन कंक्रीट का जंगल बनने से बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा हैं।
इन किसानों का कहना है कि उनकी उपजाऊ भूमि जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) अधिगृहीत करने पर आमादा है। इसके बदले जो मुआवजा आंका गया वह बहुत कम है। जेडीए यहां अपनी सबसे बड़ी आवासीय कॉलोनी बना करीब एक हजार करोड़ रुपए कमाना चाहता है। कहते हैं न, जिस देश का राजा व्यापारी हो, उसकी प्रजा भिखारी हो जाती है।
जब सरकार यानी जेडीए ही कमाई के लिए किसानों को उनकी उपजाऊ जमीन से बेदखल कर उसकी तिज़ारत से करोड़ों कमाना चाहता है, तो वह कौन-सा विकास का रास्ता अपना रहा है, जाहिर है। वैसे, इस खेल में प्रदेश में पावरफुल दोनों पार्टियों कांग्रेस और बीजेपी की बराबर की बाजी लगी। कांग्रेस के शासनकाल में हुए सर्वे के बाद अटकी पड़ी इस आवासीय योजना को बीजेपी सरकार की येन-केन-प्रकारेण सिरे चढ़ाने जि़द 'कहीं कुछ गड़बड़ी' का संदेह तो पैदा करती ही है। आरोप तो यहां तक लग रहे हैं कि बिल्डर्स और भूमाफियाओं को लाभ पहुंचाने के लिए सरकार दम लगा रही है।
कहानी शुरू हुई 2010 में
कांग्रेस के शासनकाल में जेडीए ने नींदड़ आवासीय कॉलोनी की योजना बनाई थी। इसके लिए 2010 में सर्वे हुआ। उसका विरोध तभी शुरू हो गया, तो योजना अटक गई। ग्रामीणों का कहना है कि जो सर्वे हुआ वह झूठ का पुलिंदा है। हर खेत में किसान का घर है। खेतों मेंं पेड़ सामने नज़र आ रहे हैं। कृषि भूमि बहुफसली है, लेकिन सरकार की सर्वे रिपोर्ट कहती है कि यह क्षेत्र बारानी है।

 

 

और तो और, अधिकारियों की कारस्तानी देखो कि खेतों में पेड़ और घरों के होने का उल्लेख तक नहीं है। जाहिर है, तभी से ग्रामीण उस सर्वे को सिरे से नकार कर नया सर्वे कराने की मांग पर अड़े हैं, तो कहां गलत हैं। किसानों का कहना है कि मुआवजा निर्धारण वर्ष 2009 की डीएलसी दर 30 लाख से 52 लाख रुपए प्रति बीघा के आधार पर किया गया, जबकि वर्तमान रेट एक से तीन करोड़ रुपए प्रति बीघा है। अधिग्रहण बरसों पुराने कानून के तहत हो रहा था, जबकि किसान 2013 के तहत कार्रवाई चाहते थे। साथ ही, 2010 में जब जेडीए ने आवासीय योजना की अधिसूचना अखबारों के जरिए की तभी से किसान विरोध कर रहे हैं।
ये हो रहे हैं प्रभावितनींदड़ गांव के साथ ही समीप की उन्नीस ढाणियों के पांच हजार परिवारों के करीब बीस हजार लोग प्रभावित हो रहे हैं। योजना में 1350 बीघा भूमि का अधिग्रहण प्रस्तावित है। 2013 में अवार्ड जारी तो हुआ, तो किसानों ने विरोध स्वरूप मुआवजा राशि तक नहीं ली। सरकार की जिद का आलम यह था कि मुआवजा कोर्ट में जमा करवा दिया। इसके बावजूद किसानों के भारी विरोध के चलते जेडीए जमीन का कब्जा आज तक नहीं ले पाया। ग्रामीणों कहते हैं, वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव आए तो बीजेपी के पूर्व मंत्री नरपत सिंह राजवी ने यह भूमि अधिग्रहण निरस्त करवाने का वादा किया था, जीतने के बाद वे आए ही नहीं, शायद सरकार में अहमियत नहीं मिलने के कारण।वर्तमान आंदोलन ऐसे छिड़ा हाल ही में 16 सितंबर 2017 को नींदड़ आवासीय योजना के लिए जेडीए दस्ते ने भारी पुलिसबल के साथ किसानों की जमीन पर जबरन कब्जा करना शुरू किया। इस पर किसानों ने जबरदस्त विरोध जताते हुए जेडीए को रोक दिया। साथ ही, वहीं पर 18 सितंबर से बेमियादी धरना शुरू कर दिया, जो बाद में 2 अक्टूबर से जमीन समाधि सत्याग्रह में तब्दील हो गया। अब तक सरकार अपनी जि़द पर तो किसान अपनी मांग पर अड़े हैं।