कोरोना वायरस की परिस्थिति से मुकाबले के लिए देश में तीसरे चरण का लॉकडाउन चल रहा है। मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना को लेकर देश को किये अपने 5वें संबोधन में बदले नियमों के साथ लॉकडाउन 4 की भी घोषणा कर दी है। इसके साथ ही यह स्पष्ट हो चुका है कि देश के चुनिंदा हिस्सों के नौकरीपेशा लोगों को अपने काम-काज को बंद करके और भी कुछ दिनों तक घर में बैठना पड़ेगा। ऐसी परिस्थिति में मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए सिर का दर्द बच्चों के स्कूल और स्कूल फीस बन गयी है। कोरोना वायरस से मुकाबले के लिए करीब 50 से अधिक दिनों से देश में लॉकडाउन है। इसका असर वेतनभोगी मध्यम वर्गीय लोगों की जेबों पर भी पड़ा है किन्तु निजी स्कूल अभिभावकों पर लगातार स्कूल की फीस जमा करने का दबाव डाल रहे हैं। हालांकि राज्य सरकार द्वारा राज्य के सभी निजी स्कूल प्रबंधनों से निवेदन किया गया है कि कोरोना की इस संकटपूर्ण स्थिति में वे अभिभावकों के साथ मानवीयता के साथ पेश आए और स्कूलों की फीस को ना बढ़ाया जाए। वहीं निजी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के अभिभावकों की मांग है कि अप्रैल से जून तक की स्कूल फीस को माफ कर दिया जाए।

फीस जमा करने पर दिया जा रहा दबाव:

महानगर के कई नामी निजी स्कूलों पर आरोप लगाया जा रहा है कि वे ना तो अभिभावकों के प्रति मानवीयतापूर्ण व्यवहार कर रहे हैं और ना ही राज्य सरकार के निर्देशों का पालन कर रहे हैं। स्कूल के वेबसाइट पर बने नोटिस बोर्ड पर लगातार अभिभावकों के नाम लिखे जा रहे संदेशों में उनसे स्कूल की फीस जमा कर देने का दबाव डाला जा रहा है। आरोप है कि कुछ निजी स्कूलों ने फीस जमा नहीं करने की परिस्थिति में विद्यार्थियों को ऑनलाइन कक्षाओं में शामिल नहीं होने देने की भी धमकी दी है। वहीं कुछ स्कूलों पर आरोप लगाया जा रहा है कि बच्चों को ऑनलाइन कक्षाओं में पढ़ाने वाले शिक्षकों के माध्यम से वे अभिभावकों पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

राज्य सरकार ने दी थी चेतावनी:

राज्य के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी तथा शिक्षा विभाग के मुख्य सचिव मनीष जैन की तरफ से राज्यभर के निजी स्कूलों से कई बार अनुरोध तथा चेतावनी दी जा चुकी है कि कोरोना के कारण उत्पन्न वर्तमान परिस्थिति में स्कूल ना तो अभी स्कूल फीस में वृद्धि करें और ना ही अभिभावकों पर फीस जमा करने पर दबाव बनाये। शिक्षा सचिव द्वारा जारी पत्र में चेतावनी देते हुए लिखा गया था कि राज्य सरकार इस मामले की निगरानी कर रही है। साथ ही शिक्षा मंत्री ने स्कूल फीस जमा नहीं करने पर ऑनलाइन कक्षा में शामिल नहीं होने देने के निजी स्कूलों के निर्णय को पूरी तरह से गलत बताया था।

ट्रांसपोर्ट चार्ज तथा किताबें भी बनी कमाई का जरिया :
कुछ निजी स्कूलों पर आरोप लगाया जा रहा है कि पहले ट्राईसेमेस्टर के दौरान जब बच्चे स्कूल ही नहीं जा सके, अभिभावकों पर वे उस ट्राईसेमेस्टर की फीस जमा करने का भी दबाव डाल रहे हैं। ऐसे में अभीभावकों में नाराजगी देखी जा रही है। वहीं स्कूलों द्वारा वैसे विद्यार्थी जो कंटेनमेंट जोन में नहीं रहते हैं, उनके घरों तक नये शैक्षणिक सत्र की किताबें पहुंचाने के लिए डिलीवरी चार्ज के तौर पर सैंकड़ों रुपयों की मांग की जा रही है। वहीं किताबों के लिए हजारों रुपयों की अलग से मांग की जा रही है।